चेष्टा करने पर भी हंसी को रोक न सकी। भुवनेश्वर की चंचल पुत्रवधू घूंघट की आड़ से उस नवीन पुरोहित को देखती जाती और होम-कुण्ड की आग को पंखे से तेज करती जाती थी।
पति ने आंखें दिखायीं। वधू ने मुंह तो अवश्य ही फेर लिया, किन्तु हंसी न रोक सकी। शायद उसके लिए असाध्य रही हो। उसकी हंसी का कारण कहीं हटा तो था नहीं, फिर वह गम्भीर बनती ही कैसे? वह तेजस्वी ब्राह्मण युवक कुशासन पर बैठा उसी के श्वसुर भुवनेश्वर का श्राद्ध करा रहा था। बूढ़े मिश्रजी का छोटा भाई नारायण था, जो कि प्रथम बार ही यजमान के घर आया था एवं ऐसे दायित्वपूर्ण काम पर बैठा था। कुछ शर्माता झेंपता सा काम कर रहा था। लोगों की तीक्ष्ण दृष्टियां उस पर गड़ी हुई थीं, सहस्त्रों कान सतर्क थे- उसके विधि-नियमों और संस्कृत श्लोकों पर, परन्तु नहीं, भूल, त्रुटि, अशुद्धि कहीं पर भी कुछ न निकली, नहीं तिल बराबर भी नहीं। स्वास्थ्य-सबल पर लोटता हुआ शुभ्र यज्ञोपवीत का गुच्छा उसके सौन्दर्य को और भी बढ़ा रहा था। सफेद चन्दन का टीका उसके महन्व को और नामावली उसकी निष्ठा, श्रद्धा का। मिश्रजी बीमार थे, इसलिए नारायण को यजमान के घर भेजा था। शहर के प्रायः सभी लोगों के पुरोहित मिश्र थे। बस, वधू की हंसी का कारण-छोटा सा पुरोहित ही था। बूढ़े मिश्रजी को देखने में उसकी अभ्यस्त आंखे उस लड़के को देखकर परिहास से मचल रही थीं। हां, उसके विचार से नारायण लड़का ही था। यद्यपि वह स्वयं बालिका थी, फिर भी उसके विचार में नारायण था एक बच्चा। भला बच्चे भी कहीं पुरोहित बने हैं? वह विज्ञ भाव से निश्चय पर पहुंच गयी- ऐसे बालक भी कभी पूजा-पाठ, विधि-नियमों को कर सकते हैं? और फिर श्राद्ध। नहीं, नहीं। तो इसे बुलाया ही क्यों? जरूर मां के साथ ही साथ वे भी सठिया गये हैं।
श्राद्ध के बाद ब्राह्मण-भोजन होने लगा। सभी लोग बैठे थे, पर नारायण वहां नहीं था।
‘अरे आप बैठे नहीं? आइये, आइये’-किसी ने उसे पुकारा।
‘नहीं, मैं घर पर भोजन कर लूंगा।’
‘ऐसा क्यों? मिसरजी तक यहां भोजन किया करते थे और आप ही ब्राह्मण की बनायी मिठाई है।’
‘मैं श्राद्ध का भोजन नहीं करता’- उसने शान्त भाव से कहा।
लोगों में विस्मय सा छा गया। कोई-कोई परिहास भी कर बैठा। वधू इस बार खिलखिला पड़ी। गृहिणी हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं-‘ऐसा मत करे महाराज, इस दुपहरी में भूखे-प्यासे मत जाओ, वरना गृहस्थ का अकल्याण होगा, आप पुर के हितैषी कहलाते हैं। किससे कौन सा अपराध हो गया, बतलाइये मैं उसे दण्ड दूंगी।’
वह लौटा-‘अपराध? नहीं तो। आप हाथ मत जोड़िये माताजी, मुझे पाप होगा, किन्तु में श्राद्ध का भोजन नहीं कर सकता।’ – उसके कण्ठ में विस्मय पछाड़ें खा रहा था-‘अच्छा, मैं गुड़ खाकर पानी पिये लेता हूं।’
तो यह अतिशयोक्ति न थी। नारायण था ही कुछ जिददी-सा। सुनता वह सबकी, पर करता था अपने मन की। संस्कृत के श्लोक उसे कण्ठस्थ थे। वेद, पुराण, उपनिषद् आदि उसकी जपमाला थे। लोगों से वह बहुत कम मिलता था, उन्हीें किताबों में उसके दिन-रात कट जाया करते थे। वह तभी बाहर निकलता जब कि बाहरी जगत को उसका प्रयोजन पड़ता। दुनिया के दुःख, व्यथा में वह प्राण देने को बैठ जाता। मिश्र विर2 होते-इस तरह तेरी तबीयत बिगड़ जायेगी। वह चुपचाप हट जाता। उस दिन की उस दुनिया से वह सम्पूर्ण अपरिचित था, इसलिए कुछ विमूढ़ सा भी हो गया था। गृहस्थी में थे केवल तीन प्राणी-मिश्र, मिश्र पत्नी नन्दरानी और नारायण। नन्दरानी के लड़के नहीं थे, पर इसके लिए उन्हें कष्ट भी न था, वह देवर को लड़के से भी अधिक स्नेह करती थीं।
‘नारायण, तुमने भुवनेश्वर के घर भोजन नहीं किया?’
‘जी नहीं।’
‘ऐसा क्यों किया? वे दुःखी हो रहे हैं।’
‘श्राद्ध का भोजन कैसे करता? पानी पीकर आया था।’
‘क्यों, श्राद्ध का भोजन क्या किसी तरह का पाप है?’
वह कुछ कहना चाहता था, फिर भी संभलकर बोला- ‘मेरी तबीयत नहीं चाहती।’
‘फिर कोई कारण तो जरूर होगा, बड़े-बड़े पण्डितों के साथ मैं कई बार श्राद्ध में भोजन कर आया हूं।’ इस बार बोल उठी नन्दरानी-‘तुम जो कुछ करते हो, उसे भी वही करना पड़ेगा, भला यह भी कोई बात है? अपनी-अपनी रुचि तो है। अच्छा किया भैया तुमने भोजन नहीं किया। मैंने सुना है कि श्राद्ध का भोजन अशुद्ध होता है, क्योंकि उस पर प्रेत की दृष्टि पड़ जाती है।’
मिश्र जी की हंसी से बाहर के लोग चौंक पड़े। केवल नारायण गम्भीर हुआ।
‘फिर ऐसा कहा। इसीसे तुमने भोजन नहीं किया?’ इस बार भी नारायण मौन ही साधे रहा।
‘मैं ऐसा नहीं कहता कि तुम अपनी इच्छा के विरुद्ध ही भोजन किया करो, किन्तु किसी को दुखाना ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध है।’
‘यदि धर्म के विरुद्ध काम हो तो भी किसी को तुष्ट करने के लिए उसे करना चाहिए?’
‘अवश्य नहीं। न्याय धर्म के लिए यदि प्राण चला जाए तो जाने दो, पर धर्म, निष्ठा और सत्य को केवल ब्राᅠण नहीं, मनुष्य मात्र कभी भी नहीं छोड़ सकता, याने छोड़ना उचित नहीं है।’
‘यदि मेरी आत्मा ने श्राद्ध के भोजन को अशुद्ध समझा हो?’
मिसर हंसे- सरल, उदार हंसी-‘वही बात। यानी अपनी भौजी के मत से तुम सहमत हो। फिर तुमने ठीक ही किया है।’
‘मैं भी कुछ-कुछ जानती हूं, बिलकुल अपढ़ नहीं हूं।’ नन्दरानी प्रसन्न हो रही थीं।
‘लो-भला तुम न जानोगी? पुरोहित की सहधर्मिणी ही ठहरीं’ यह था रूखा परिहास। नारायण चुपचाप बाहर चला गया।
फिर भी नारायण की ख्याति से देश भर उठा। किसी ने परिहास से मुंह फेरा तो किसी ने सम्मान में श्रद्धा से सिर नवाया। कोई कहता-अरे वह घमण्डी छोकड़ा-जिसके दूध के दांत भी न गिरे होंगे वह भला पुरोहित बन सकता है, और श्राद्ध जैसे एक बड़े महात् काम को कहीं कर सकता है? हां, मिसर जी की बात निराली है। वे लिखे-पढ़े पण्डित ही ठहरे। दूसरा प्रतिवाद कर उठता- चुप भी रहो भाई, कहां मिश्रजी और कहां नारायण। उमर कम होना ही यदि विद्या नापने की कसौटी हो तो कहने-सुनने के लिए कुछ भी अवशिष्ट नहीं रहता। हा, मिसरजी निष्ठावान् सत्यवादी, सच्चे दिल के ब्राह्मण जरूर ही हैं, पर विद्या में नारायण को नहीं पा सकते। संस्कृत पाठशाला में वर्षों उन्होंने नारायण को पढ़ाया। भाई के पीछे बहुत खर्च किया, फिर भाई भी वैसा ही निकला है।’
कोई विद्वान कह उठता- ‘भाई वाह। बहुत दिनो के पीछे उस दिन मैंने यथार्थ संस्कृत श्लोक सुने। अशुद्धि कहीं कुछ भी न थी। पहाड़ी झरने की भांति श्लोक झर रहे थे, कहीं तिनका भर रुकावट न थी, साफ-सुथरे श्लोक। मानो सरस्वती उसके कण्ठ में बसी हों। भुवनेश्वर का श्राद्ध देखने की वस्तु थी।’
बात फैल गयी, बिजली की भांति-शीघ्रता से। जमींदार के घर नारायण की पुकार पड़ी। बड़े भार्व के साथ मिश्र जी ने लोगों में यह बात कह दी-÷मेरे नारायण को जमींदार ने अपनी विधवा बेटी उमा को संस्कृत पढ़ाने के लिए चुना है।’
उमा किताब खोले एक तेजस्वी सुन्दर ब्राह्मण का मुंह निहारती रहती। शायद ही किताबों के अक्षर कुछ उसकी समझ में आते हों। और नारायण किताबों में आंखे गड़ाकर अपनी छात्रा को समझा चलता। पढ़ाते-पढ़ाते कभी वह किताबों के भीतर अपने को खो बैठता, देश, काल, पात्र का विचार न रहता और न उस छात्रा ही का। घण्टों बीत जाया करते। विधवा जलपान लेकर जब उसे पुकारती ‘पण्डित जी बारह बज रहे हैं, पानी पी लीजिये।’ तब वह चौंक पड़ता, विनय के साथ कहता-‘दो बार से ज्यादा तो मैं नहीं खाता, चाय तो पीता ही नहीं, बहन।’
‘नारायण भैया, पण्डित तो धोखा दे गये। दिन भर से उपास किये बैठे हैं। बिरादरी वाले दरवाजे जमा हैं। अब हमारी लाज तुम्हारे हाथ में है, चाहे रखो या मारो।’
‘मुझे क्या करना है, बलदेव मामा?’
बलदेव ढीमर नारायण के पास गिड़गिड़ा रहा था- ‘मैं कह तो नहीं सकता भैया, पर कृपाकर यदि सत्य नारायण की कथा बांच दो …।’
ढीमरों के पण्डित कोई दूसरे ही थे, वह उस दिन आये न थे।
‘नारायण जी की कथा बांचना है तो साफ-साफ क्यों नहीं कहते, चलो-चलो। भला उनकी कथा बांचने में भी कोई इनकार कर सकता है?’
‘तुम वहां चले जाओगे तब मेरी दशा क्या होगी भैया?’ कुबेर जैसवारा की बूढ़ी मां हाथ जोड़कर खड़ी थी।
‘मैं जल्दी लौटूंगा दादी, अब जवान लड़की का ब्याह कैसे करूं भैया, बच्चे और बूढ़े से लेकर कोई आठ आदमी खाने को हैं। घास काटकर जो कुछ पाती हूं उससे पेट भर दाना भी नहीं मिलता। लड़की सयानी हुई। एक पैसा भी घर में नहीं है। रामावतार ने कहा, नारायण भैया के पास जा, वे कुछ न कुछ कर देंगे।’
वह विचलित हुआ- अहा, बेचारी बुढ़िया। किन्तु उसके पास एक कौड़ी भी न थी, फिर भी उसने कहा-‘अच्छा तुम घर जाओ दादी, जल्दी ही हम लोग कुछ प्रबन्ध करेंगे।’
नारायण पढ़ा रहा था और वह पढ़ रही थी। ‘रुपयों का प्रबन्ध अवश्य करूंगा-‘ अनमने नारायण के मुंह से निकल गया।
वह खिलखिलाकर हंस पड़ी।
नारायण विस्मित हुआ-‘हंसी क्यों बहन?’
‘आप यह क्या कह रहे हैं’ कैसा प्रबन्ध? किसका रुपया?’
नारायण आवाक् रहा, मन ही मन विचारने लगा- क्या यह नारी अन्तर्यामी है?
‘मरे मन की बात तुम कैसे समझी बहन?’
‘अभी तो आप ही कह रहे थे।’
‘मैं? होगा भी।’
‘क्या आपको रुपये की जरूरत है?’
‘है।’
अकपट सरल उत्तर सुनकर विधवा आनन्दित हुई-‘तो कितने रुपये चाहिए?’ उसने धीरे से पूछा।
‘उससे पूछ लूं।’
‘किससे?’ उसका विस्मय सीमा-रेखा को लांघ रहा था।
धीरे-धीरे सभी बातों को सुनकर, उस शिशु-स्वभाव दयालु पण्डित के प्रति श्रद्धा-भक्ति से उसका दिल भर उठा। वही उठी-‘आप इन जेवरों को उसे दे दीजिये, मेरे विचार से इसमें उसकी शादी हो जायगी।’
प्रसन्नता के साथ उसने कहा-‘ईश्वर अचला मति रहे बहन, किन्तु तुम फिर पहनोगी क्या?’
उसके दिल में यह विचार तक न उठा कि गृहस्वामी के अगोचर में उन्हीें की विधवा युवती कन्या का दान लेना उचित है या नहीं।
वह हंसी-मलिन-व्यथातुर हंसी-‘जेवर तो मैं नहीं पहनती पण्डित जी।’
उसने उसकी ओर दृष्टि फेरी-इतने दिनों के बादा हां, ठीक तो है।
वह लज्जित हुआ- ‘मैं भूल गया था।’
‘तो क्या हुआ। आप इन्हें ले जाइये, उस बेचारी का काम चलेगा।’
‘ईश्वर अचला मति रहे और दरिद्रों पर अविनाशी दया’- उसने फिर आशीर्वाद दिया।
‘क्या तुमन ढीमर के घर कथा बांची थी?’ मिश्र जी ने नारायण से पूछा। नन्दरानी भी आकर खड़ी हो गयीं।
‘हां।’
‘जमींदार के घर कई लोग इक्कट्ठे हुए हैं। मुझे और नारायण को भी वहां बुलाया है। शूद्र के घर यजमानी क्यों किया-वहां का प्रश्न यही है।’
‘बात तो ठीक है, तुम वहां क्यों गये भैया? इस वंश में कभी किसी ने शूद्र की यजमानी नहीं की।’
‘भगवान की लीला सुनने के अधिकारी मनुष्य-मात्र हैं, भौजी।’
‘तो शूद्र के घर निष्ठावान ब्राह्मण क्यों नहीं जाते?’
‘सो तो मैं नहीं जानता। अपनी-अपनी रुचि तो है।’
‘कुछ भी हो, तुम कह देना कि मैं कुबेर के घर नहीं गया।’ नन्दरानी ने कहा।
‘झूठ बोलूंगा?’ वह विस्मय से विमढ़ सा हो रहा था। ‘और ऐसा कहूं क्यों’ नारायण जी की पूजा के लिए यदि कोई भी बुलावेगा तो जरुर जाऊंगा, क्या ईश्वर किसी एक के छोर में बंधे रहते हैं? वे सबके हैं, उनकी लीला सुनने का, उनकी पूजा करने का अधिकार सारी दुनिया को है, वह संकीर्ण नहीं, उदार हैं, भौजी।’
‘तो तुम वहां पर यही सब कहोगे?’- उसका मुंह सूख रहा था-‘आज तक मिसर जी को इस तरह से बुलाने की हिम्मत किसी की भी न हुई थी, भैया, यह बड़ा अपमान है।’ मिश्रजी अभी तक चुपचाप सभी बातें सुन रहे थे। इस बार आदर से नारायण की पीठ ठोंककर बोले-
‘झूठ बोलूंगा?’ वह विस्मय से विमढ़ सा हो रहा था। ‘और ऐसा कहूं क्यों’ नारायण जी की पूजा के लिए यदि कोई भी बुलावेगा तो जरुर जाऊंगा, क्या ईश्वर किसी एक के छोर में बंधे रहते हैं? वे सबके हैं, उनकी लीला सुनने का, उनकी पूजा करने का अधिकार सारी दुनिया को है, वह संकीर्ण नहीं, उदार हैं, भौजी।’
‘तो तुम वहां पर यही सब कहोगे?’- उसका मुंह सूख रहा था-‘आज तक मिसर जी को इस तरह से बुलाने की हिम्मत किसी की भी न हुई थी, भैया, यह बड़ा अपमान है।’ मिश्रजी अभी तक चुपचाप सभी बातें सुन रहे थे। इस बार आदर से नारायण की पीठ ठोंककर बोले-
‘शाबाश। सत्य को कभी न छोड़ना, कभी भी झूठ मत बोलना। जमींदार के घर मैं न जाऊंगा।’
कुछ इतस्ततः करने के बाद वह फिर बोले- ‘तुम्हें केवल आज ही के लिए नहीं रोक रहा हूं। सदा के लिए कहता हूं, उस घर में तुम कभी मत जाना।’
‘अच्छा’ जाते जाते वह लौटा-‘तो बहन को कौन पढ़ावेगा?’
‘तुमसे कहना नहीं चाहता था, पर कह देना ही ठीक है। तुम्हें और उस दया की मूर्ति विधवा को बचपन से भली भांति जानता हूं। तुम हो सत्य और वह है दया। तुम हो शिशु, वह है प्रवीणा। निष्ठा तुम हो तो वह त्याग है। ज्ञान तुम हो तो वह बुद्धि अवश्य ही है और यदि तुम्हारा देवता होना निश्चित है तो उसका संयम की जीवन्त मूर्ति होना भी अनिश्चित नहीं है। यह सब कुछ सच होते हुए भी दुनिया की दृष्टि में पाप है। उसकी उस दया के दान को लोग पाप की दृष्टि से देख रहे हैं। जगत् के विचार से यह केवल प्रेम का खेल चल रहा है। बदनामी के भय से जमींदार चुप तो जरुर है, पर वह तुम्हारा भीषण शत्रु बन बैठा है। वहां मत जाना।’
हाथों में मुंह ढांककर नारायण चिल्ला उठा-
‘भैया-भैया, बस करिये।’
मिश्रजी ने उसे छाती से लगा लिया।
रात की गहरी अंधेरी में किसी ने मिश्रजी का दरवाजा खटखटाया।
द्वारा खुलते ही जमींदार ने आकर मिसर के पैर पकड़ लिये-‘भास्कर की जान बचाइये मिसर।’
मिश्रजी सब कुछ सुन चके थे-याने जमींदार-पुत्र भास्कर गुस्से में आकर नौकर को मारने के लिए दौड़ा था। マपर की छत खुली हुई थी। दौड़ने की धुन में नौकर नीचे गिर पड़ा, उसी व2 उसकी मौत भी हो गयी थी और साथ ही साथ पुलिस ने भास्कर को पकड़ लिया था। पुलिस का कहना था कि किसी ने उसे ढकेल दिया और भास्कर का कहना था कि वह अपने आप गिर पड़ा, जानबूझकर नहीं, धोखे से।
‘मुझे क्या करना पड़ेगा?’
‘केवल इतना ही कि नारायण के बदले उस दिन आप गये थे और छत की धूप में बैठकर उमा को पढ़ा रहे थे। नौकर गीले कपड़े छत पर डाल रहा था, धोखे से वह नीचे-रास्ते में गिर पड़ा, किसी ने उसे ढकेला नहीं था।’
‘वह मेरा एक ही लड़का है मिसर और निरपराध भी। हजारों की गवाही से जो न होगा, तुम्हारी एककी बात से वह हो जायेगा। तुम्हें कौन नहीं जानता? तुम जैसे सत्यवादी की बात को कोई झूठ नहीं कह सकता, मेरे भास्कर की जान बचाओ मिसर।’
‘पर मैं झूठ नहीं बोल सकूंगा भैया’ – शव की नाई विवर्ण मुख से मिश्र ने कहा।
‘वह मेरा एक ही लड़का है, आपकी जरा सी बात से एक जान बच जायेगी, यह अधर्म नहीं धर्म है भाई।’
‘किन्तु तुलसी और गंगाजल हाथ में लेकर मैं झूठ कैसे कहूंगा? उसके पीछे मेरी ही आत्मा मुझसे मुंह फेर लेगी घृणा और विराग से। तब मैं उस अशुचि आत्मा से देवता का पूजन कैसे करूंगा?’
‘तो नारायण को कहने के लिए कह दो।’
‘वह कहेगा झूठ? क्या तुम उसे पहचानते नहीं हो?’
‘पर यह झूठ नहीं है, शालिग्राम शिला हाथ में लेकर मैं कह सकता हूं यह झूठ नहीं है। वह अपने आप ही गिरा था।’
‘निमिन-भागी भास्कर अवश्य ही हुआ है। फिर मैं वहां था नहीं, तब तुलसी हाथ में लेकर कैसे कह दूंगा?’
नारायण वहां से हट गया।
‘कचहरी में तुम झूठ बोल आये? तुलसी और गंगाजल हाथ में लेकर।’ नन्दरानी के स्वर में विस्मय के साथ ही साथ खेद भी था।’
‘हां भौजी’- वह खुशी से मस्त हो रहा था।
‘जवाब दो भैया, ऐसा क्यों किया?’
‘निर्दोष की जान बचाने के लिए, भौजी।’
‘तुम सदा के लिए नरक में डूब गये, इसका भी कुछ विचार है।’
‘नरक तो अपने मन में है, पर आश्चर्य तो यह है कि मुझे आज खुशी हो रही है-बहुत ज्यादा। चलो भूख लगी है भौजी।’
मिश्रजी चुपचाप उसका मुंह निहारते रह गये।
(यू.एन.एन.)
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