रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध की स्थिति में जानिए कौन किस देश का समर्थन करेगा

यूक्रेन और रूस के बीच तनाव दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है और अमेरिका की माने तो रूस कभी भी यूक्रेन पर आक्रमण कर सकता है। यूएनएससी आज यूक्रेन के अनुरोध पर न्यूयॉर्क में एक आपात बैठक आयोजित कर रहा है जहां रूस द्वारा यूक्रेन के दो प्रांतों लुहान्स्क और डोनेट्स्क को स्वतंत्र देशों के रूप में मान्यता देने के मुद्दे पर चर्चा की जाएगी।

नई दिल्लीः यूक्रेन (Ukraine) और रूस (Russia) के बीच तनाव दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है और अमेरिका (America) की माने तो रूस कभी भी यूक्रेन पर आक्रमण कर सकता है। यूएनएससी आज यूक्रेन के अनुरोध पर न्यूयॉर्क में एक आपात बैठक आयोजित कर रहा है जहां रूस द्वारा यूक्रेन के दो प्रांतों लुहान्स्क और डोनेट्स्क को स्वतंत्र देशों के रूप में मान्यता देने के मुद्दे पर चर्चा की जाएगी।

रूस के इस कदम के बाद अमेरिका निश्चित रूप से चुप नहीं बैठेगा। यूक्रेन पर रूसी बलों द्वारा आक्रमण के मामले में नाटो सेनाएं जवाबी कार्रवाई के लिए पहले से ही तैयार हैं। लेकिन कई देश ऐसे भी हैं जो इस समय रूस की मदद कर रहे हैं। चीन रूस का खुलकर समर्थन कर रहा है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कौन सा देश किस तरफ है।

दरअसल, 2004 में अमेरिका ने सोवियत संघ के पूर्व देशों बुल्गारिया, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, रोमानिया, स्लोवाकिया और स्लोवेनिया को नाटो का सदस्य बनाया था। ऐसे में रूस के सबसे करीबी इन देशों से चुनौती होगी। नाटो में वर्तमान में 30 देश शामिल हैं। इनमें से करीब 10 रूस के आसपास के इलाकों में हैं।

नाटो से रूस को होगी चुनौती
यूक्रेन संकट से निपटने के मद्देनजर अमेरिका ने अपने नौ हजार सैनिकों को स्टैंडबाय पर रखा है। इनमें से पांच हजार सैनिक, जो नाटो का हिस्सा हैं, वर्तमान में रूस के पड़ोसी पोलैंड में हैं, जबकि चार हजार सैनिक रोमानिया और बुल्गारिया में हैं।

यूक्रेन संकट का सबसे अधिक प्रतिरोध संयुक्त राज्य अमेरिका से है। अमेरिका ने युद्ध की स्थिति में यूक्रेन को अपना समर्थन देने की घोषणा की है। हालांकि अमेरिका और नाटो देशों ने कहा है कि वे युद्ध के मकसद से अपने सैनिकों को सीधे यूक्रेन नहीं भेजेंगे, लेकिन हथियार, चिकित्सा सुविधाएं आदि जैसी अन्य सहायता देना जारी रखेंगे।

इसी कड़ी में नाटो देशों के कई अत्याधुनिक लड़ाकू विमान और हथियार भी यूक्रेन पहुंच रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि नाटो के यूरोपीय सदस्य देश व्यापार हितों को देखते हुए अमेरिका की तरह आक्रामक नहीं हैं। जर्मनी और फ्रांस के प्रमुखों ने हाल ही में मास्को का त्वरित दौरा कर विवाद को शांत करने की कोशिश की है।
यूरोप के कई देशों की रूस पर निर्भरता बढ़ गई है। इसलिए ये देश हर हाल में शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं। यूरोपीय देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती नॉर्ड गैसपिपलाइन को लेकर है, जो रूस और जर्मनी के बीच लगभग तैयार है और यूरोप इस पाइपलाइन को गहराते ऊर्जा संकट के लिए जरूरी मानता है।

अगर नाटो के यूरोपीय देश यूक्रेन का पूरा समर्थन करते हैं, तो रूस इस पाइपलाइन को रद्द कर सकता है। हालांकि, नाटो के यूरोपीय सदस्य देशों को रूस के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी में सहयोग करना होगा। अमेरिका ने रूसी बैंकिंग प्रणाली को नुकसान पहुंचाने की पूरी कोशिश की है।

नाटो के यूरोपीय देशों में ब्रिटेन की स्थिति कुछ हद तक संयुक्त राज्य अमेरिका के समान है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा है कि रूस के इस कदम से यूक्रेन की संप्रभुता का उल्लंघन होगा। यह कदम अंधकार की ओर ले जाएगा। निकारागुआ के ओर्टेगा ने यूक्रेन पर रूस के रुख का बचाव किया है।

यूक्रेन संकट के बीच रूस को चीन से सबसे मजबूत समर्थन मिलेगा। चीन पहले ही घोषणा कर चुका है कि नाटो यूक्रेन में मनमानी कर रहा है। जब से पश्चिमी देशों का रुख चीन के खिलाफ हुआ है, रूस हमेशा से चीन का समर्थन करता रहा है।

चीन और रूस के संबंध पिछले दो दशकों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। दोनों देशों के बीच मजबूत आर्थिक और सैन्य संबंध हैं। दोनों अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक दूसरे का साथ देते रहे हैं। इसलिए चीन हर हाल में रूस का समर्थन करेगा। चीन का मजबूत सहयोगी उत्तर कोरिया भी रूस का समर्थन करेगा।

रूस को पांच पड़ोसी देशों का समर्थन
रूस, आर्मेनिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और बेलारूस के बीच सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (सीएसटीओ) समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। छह देश सोवियत संघ से अलग हो गए। यानी रूस पर हमले की स्थिति में ये देश इसे अपने ऊपर हमला मानेंगे.

अमेरिका के साथ ईरान की तनातनी किसी से छिपी नहीं है। जब से ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता विफल हुआ है, रूस ईरान का समर्थन करता रहा है। इसलिए ईरान का रुख भी साफ है।

भारत और रूस के बीच न केवल कई दशकों से मजबूत सैन्य संबंध हैं बल्कि एक दूसरे के देशों के लोगों के बीच मजबूत सांस्कृतिक संबंध भी हैं। चीन को छोड़कर रूस हर मामले में भारत का साथ देता रहा है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में रूस ने संयुक्त राष्ट्र में वीटो का प्रयोग कर भारत का दो बार समर्थन किया है।

आज भी भारत की सैन्य जरूरतें रूस पर ज्यादा निर्भर हैं। चूंकि भारत हमेशा गुटनिरपेक्षता में विश्वास रखता है, भारत ने यूक्रेन के मुद्दे पर तटस्थ रुख अपनाया है। हाल ही में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कहा है कि इस मुद्दे का शांतिपूर्ण समाधान खोजने के लिए कूटनीतिक बातचीत सबसे अच्छा तरीका है।

भारत में रूसी दूतावास ने एक बयान जारी कर भारत के इस कदम का स्वागत किया है। नई दिल्ली में रूसी दूतावास ने कहा, “हम भारत के संतुलित, सैद्धांतिक और स्वतंत्र रुख का स्वागत करते हैं।

(एजेंसी इनपुट के साथ)

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