जलवायु परिवर्तन के कारण कर्नाटक गंभीर सूखे का सामना कर रहा है और सूखे के बीच उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। राजस्थान के बाद कर्नाटक दूसरा ऐसा राज्य है जहां सबसे ज्यादा सूखा पड़ता है। कावेरी नदी का पानी और भूजल संसाधन वहां के स्थानीय लोगों के लिए सामान्य स्रोत हैं।
लगभग आठ साल पहले, पेरिस समझौते के अंतर्गत सभी देश ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिए सहमत हुए थे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि सभी देश शब्दों के साथ कार्रवाई करने में विफल रहे हैं। वैश्विक उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है, कम नहीं हो रहा।
लगभग सभी प्लास्टिक जीवाश्म ईंधन (ज्यादातर तेल और गैस) से बने पदार्थों (जैसे एथिलीन और प्रोपलीन) से प्राप्त होते हैं। उन ईंधनों को निकालने और परिवहन करने की प्रक्रिया, फिर प्लास्टिक के निर्माण से अरबों टन ग्रीनहाउस गैसें बनती हैं। उदाहरण के लिए, दुनिया के वार्षिक पेट्रोलियम उत्पादन का 4% प्लास्टिक बनाने में लगाया जाता
उत्तर भारत के सभी हिस्सों में लगभग हर कोई इस समय भीषण गर्मी का सामना कर रहा है। भारत ही नहीं बल्कि भारत समेत पाकिस्तान में भी जानलेवा लू की तैयारी की जा रही है. यह वह क्षेत्र है जहां दुनिया में हर पांच में से एक व्यक्ति रहता है। पाकिस्तान के जैकोबाबाद में तापमान
जब से प्रधान मंत्री मोदी ने ग्लासगो में 2070 तक भारत को शुद्ध शून्य घोषित करने की घोषणा की, तब से नेट जीरो एक लोकप्रिय शब्द बन गया है। गूगल पर जैसे ही मैंने “व्हाट इज नेट जीरो” लिखा, 0.74 सेकेंड में 3,78,00,00,000 रिजल्ट आ गए। लेकिन भारत को नेट जीरो होने के लिए भारत
पूरी मानवता के अस्तित्व के लिये खतरा बन रही ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिये वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के अधिक प्रभावी उपाय तलाशने के मकसद से ब्रिटेन के ग्लासगो में आयोजित COP26 शिखर वार्ता में विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। इस सन्दर्भ में विशेषज्ञों का मानना है
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने यूरोपीय संघ के समर्थन से मीथेन उत्सर्जन को कम करने के लिए एक कार्यवाही के अंतर्गत एक नई ऑब्जर्वेटरी का शुभारंभ किया। मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है जो की वर्तमान में जलवायु वार्मिंग के कम से कम एक चौथाई के लिए जिम्मेदार है। इंटरनेशनल मीथेन एम्मिशन ऑब्जर्वेटरी (IMEO)
व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया को न केवल जलवायु अनुकूलन के लिए एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण की जरूरत है, बल्कि विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निवेश कार्यक्रमों के साथ ऐसा करने की जरूरत है। नीतियों द्वारा समर्थित
एक ताज़ा शोध में पाया गया है कि दुनिया के कुछ सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश जलवायु परिवर्तन से निपटने में उतना नहीं खर्च करते जितना अपनी सीमाओं के सशक्तिकरण पर खर्च करते हैं। COP 26 से पहले, अनुसंधान और एडवोकेसी थिंकटैंक ट्रांसनेशनल इंस्टीट्यूट (TNI) ने बॉर्डर हिंसा और जलवायु परिवर्तन के बीच की कड़ी
अगले महीने ग्लासगो में आयोजित होने वाला COP26 और दिसंबर में इटली द्वारा आयोजित होने वाला G20 जलवायु परिवर्तन से संबंधित मुद्दों पर वास्तव में उपयोगी बातचीत के लिए मंच हैं, ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 ° C से नीचे रखते हुए और जलवायु वित्तपोषण। इसे यादगार बनाने की जरूरत है। जब जलवायु परिवर्तन से निपटने