यहां जानिए भगवान गणेश ने महाभारत क्यों और किस शर्त पर लिखी थी?

गणेश जी की शर्त थी कि महर्षि कथावाचन में एक क्षण भी विश्राम नहीं करेंगे। अगर वह एक पल भी रुके तो गणेश वहाँ लिखना बंद कर देंगे। महर्षि ने उनकी बात मान ली और अपनी एक शर्त भी रखी कि गणेश जी बिना समझे कुछ नहीं लिखेंगे। प्रत्येक पंक्ति को लिखने से पहले उसका अर्थ समझना होगा। गणेश जी ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया।

ज्ञान के दाता, ज्ञान दाता भगवान गणपति के जीवन का हर अध्याय उनके अनुपम रूप के समान अद्भुत है। विद्या और लेखन के स्वामी माने जाने वाले गणपति जी को सभी देवताओं में सबसे अधिक धैर्यवान और स्थिर माना जाता है। उनकी लेखन शक्ति भी अद्वितीय मानी गई है।

यह कहानी उस समय की है जब महर्षि वेद व्यास महाभारत नामक महाकाव्य की रचना शुरू करने जा रहे थे। अपने महाकाव्य के लिए उन्हें एक ऐसे लेखक की तलाश थी जो उनके विचारों की गति को बाधित न करे। इसी क्रम में उन्होंने भगवान गणेश का स्मरण किया और आग्रह किया कि श्री गणेश उनके महाकाव्य के रचयिता बनें। गणेश जी ने उनकी बात मान ली, लेकिन साथ ही एक शर्त रखी।

गणेश जी की शर्त थी कि महर्षि कथावाचन में एक क्षण भी विश्राम नहीं करेंगे। अगर वह एक पल भी रुके तो गणेश वहाँ लिखना बंद कर देंगे। महर्षि ने उनकी बात मान ली और अपनी एक शर्त भी रखी कि गणेश जी बिना समझे कुछ नहीं लिखेंगे। प्रत्येक पंक्ति को लिखने से पहले उसका अर्थ समझना होगा। गणेश जी ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया।

इस तरह दोनों विद्वान एक साथ आमने-सामने बैठ गए और अपनी भूमिका निभाने लगे। महर्षि व्यास ने बहुत तेज गति से बोलना शुरू किया और भगवान गणेश ने उसी गति से महाकाव्य लिखना जारी रखा। इस गति के कारण गणेश जी की कलम अचानक टूट गई, वे ऋषि की गति के साथ तालमेल बिठाने लगे। इस स्थिति में, हार न मानते हुए, गणेश ने अपना एक दांत तोड़ दिया और स्याही में डुबो कर लिखना जारी रखा।

गणेश जी को दिया एक नया नाम एकदंत

साथ ही उन्होंने महसूस किया कि उन्हें अपनी लेखन गति पर गर्व था और वह ऋषि की क्षमता को कम आंक रहे थे। महर्षि ने अपने अभिमान को तोड़ने के लिए ही बहुत तेज गति से कथा सुनाई। साथ ही ऋषि भी समझ गए कि गजानन की तेज बुद्धि और दृढ़ता का कोई मुकाबला नहीं है। इसी के साथ उन्होंने गणेश को एक नया नाम एकदंत दिया।

दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे की शक्ति, क्षमता और बुद्धि को स्वीकार करने के बाद, महाकाव्य लिखने का कार्य समान जोश और ऊर्जा के साथ शुरू हुआ। कहा जाता है कि इस महाकाव्य को बनने में तीन साल लगे। इन तीन वर्षों में एक बार भी गणेश ने ऋषि को एक क्षण के लिए भी नहीं रोका, जबकि महर्षि ने भी इस शर्त को पूरा किया।

महाभारत में एक लाख अंतर

महाकाव्य के दौरान जब भी उन्हें आराम की आवश्यकता होती, वे बहुत कठिन अंतरा का उच्चारण करते। शर्त के अनुसार गणेश जी बिना समझे कुछ भी नहीं लिख सकते थे। इसलिए गणेश को जितना समय उस अंतर को समझने में लगा होता, उतना ही समय में ऋषि ने विश्राम किया होता। ऐसा माना जाता है कि महाभारत के कई महाकाव्य कहीं खो गए हैं। इसके बावजूद आज भी महाभारत में एक लाख अंतरा हैं।

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