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गीता ज्ञान : जिस कर्तव्य को हम निभाने जा रहे हैं क्या वह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचारित है?

Published by
Netra Singh Rawat

गीता अध्याय 2 श्लोक 2 में
कहां गया है किसी भी व्यक्ति को अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिए या नहीं इसके लिए तीन बातें ध्यान में रखनी चाहिए। जिस कर्तव्य को हम निभाने जा रहे हैं क्या वह श्रेष्ठ अथवा आर्य पुरुषों द्वारा आचारित है तथा क्या यह लौकिक अथवा पारलौकिक दृष्टि से हमारे लिए लाभकारी है ।

श्रीभगवानुवाच।
कुतस्तवा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वय॑मकीर्तिकरमर्जुन॥2॥

श्रीभगवान्-उवाच-भगवान श्रीकृष्ण ने कहा; कुत:-कहाँ से; त्वा-तुमको; कश्मलम्-मोह, कायरता,अज्ञान; इदम्-यह; विषमे- इस संकटकाल में; समुपस्थितम्-उत्पन्न हुआ; अनार्य-अशिष्ट जन; जुष्टम्-सद्-आचरण योग्य; अस्वर्ग्यम्-उच्च लोकों की ओर न ले जाने वाला; अकीर्तिकरम्-अपयश का कारण; अर्जुन- हे अर्जुन ।

भावार्थ : श्रीभगवान ने कहा- हे अर्जुन! तुम्हे इस विषम समय में यह कायरता अथवा अज्ञान किस कारण से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को ही देने वाला है और न संसार में यश को बढ़ाने वाला ही है।

श्लोक में अर्जुन संबोधन देने का अर्थ यह है कि उनका अंत:करण स्वच्छ और निर्मल है । अतः तुम्हारे स्वभाव में आज्ञान अथवा कायरता का आना उचित नहीं है तो फिर तुम्हारे में ये दोष कैसे आ गए। इस पर भगवान को आश्चर्य हो रहा है।यह आश्चर्य अर्जुन को सतर्क करने के लिए है जिससे कि उसका ध्यान अपने कर्तव्य पर चला जाए।

कुतः कहनेका तात्पर्य यह है कि मूलमें यह कायरतारूपी दोष तुम्हारेमें (स्वयंमें) नहीं है। यह तो आगन्तुक दोष है जो सदा रहनेवाला नहीं है। समुपस्थितम् कहनेका तात्पर्य है कि यह कायरता केवल तुम्हारे भावोंमें और वचनोंमें ही नहीं आयी है किन्तु तुम्हारी क्रियाओं में भी आ गयी है। यह तुम्हारे पर अच्छी तरहसे छा गयी है जिसके कारण तुम धनुषबाण छोड़कर रथके मध्यभागमें बैठ गये हो।

अनार्यजुष्टम् : समझदार श्रेष्ठ मनुष्योंमें जो भाव पैदा होते हैं वे अपने कल्याणके उद्देश्यको लेकर ही होते हैं। इसलिये श्लोक में भगवान् सबसे पहले उपर्युक्त पद देकर कहते हैं कि तुम्हारेमें जो कायरता आयी है उस कायरताको श्रेष्ठ पुरुष स्वीकार नहीं करते। कारण कि तुम्हारी इस कायरतामें अपने कल्याणकी बात बिलकुल नहीं है। कल्याण चाहनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों में अपने कल्याणका ही उद्देश्य रखते हैं। उनमें अपने कर्तव्यके प्रति कायरता उत्पन्न नहीं होती। परिस्थिति के अनुसार उनको जो कर्तव्य प्राप्त हो जाता है उसको वे कल्याण प्राप्ति के उद्देश्य से उत्साह और तत्परतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग करते हैं। वे तुम्हारे जैसे कायर होकर युद्धसे या अन्य किसी कर्तव्य कर्मसे उपरत नहीं होते।

अतः युद्धरूप से प्राप्त कर्तव्यकर्म से उपरत होना तुम्हारे लिये कल्याणकारक नहीं है। अस्वर्ग्यम् कल्याणकी बात सामने न रखकर अगर सांसारिक दृष्टिसे भी देखा जाय तो संसारमें स्वर्गलोग ऊँचा है। परन्तु तुम्हारी यह कायरता स्वर्गको देनेवाली भी नहीं है अर्थात् कायरतापूर्वक युद्धसे निवृत्त होनेका फल स्वर्गकी प्राप्ति भी नहीं हो सकता। अकीर्तिकरम् अगर स्वर्गप्राप्तिका भी लक्ष्य न हो तो अच्छा माना जानेवाला पुरुष वही काम करता है जिससे संसारमें कीर्ति हो। परन्तु तुम्हारी यह जो कायरता है यह इस लोकमें भी कीर्ति (यश) देनेवाली नहीं है प्रत्युत अपकीर्ति (अपयश) देनेवाली है। अतः तुम्हारेमें कायरताका आना सर्वथा ही अनुचित है।

भगवान ने अनार्यजुष्टम् , अस्वर्ग्यम् और अकीर्तिकरम् ऐसा क्रम देकर तीन प्रकारके मनुष्य बताये हैं: (1) जो विचारशील मनुष्य होते हैं वे केवल अपना कल्याण ही चाहते हैं। उनका ध्येय उद्देश्य केवल कल्याणका ही होता है। (2) जो पुण्यात्मा मनुष्य होते हैं वे शुभकर्मों के द्वारा स्वर्गकी प्राप्ति चाहते हैं। वे स्वर्गको ही श्रेष्ठ मानकर उसकी प्राप्ति का ही उद्देश्य रखते हैं। (3) जो साधारण मनुष्य होते हैं वे संसार को ही आदर देते हैं।

इसलिये वे संसारमें अपनी कीर्ति चाहते हैं और उस कीर्ति को ही अपना ध्येय मानते हैं।उपर्युक्त तीनों पद देकर भगवान् अर्जुनको सावधान करते हैं कि तुम्हारा जो यह युद्ध न करनेका निश्चय है यह विचारशील और पुण्यात्मा मनुष्योंके ध्येय कल्याण और स्वर्गको प्राप्त करानेवाला भी नहीं है तथा साधारण मनुष्योंके ध्येय कीर्तिको प्राप्त करानेवाला भी नहीं है। अतः मोहके कारण तुम्हारा युद्ध न करनेका निश्चय बहुत ही तुच्छ है जो कि तुम्हारा पतन करनेवाला तुम्हें नरकों में ले जानेवाला और तुम्हारी अपकीर्ति करनेवाला होगा।

इससे हमें यह शिक्षा मिलती है की जब भी हम कोई कार्य करें तो यह अवश्य विचार कर ले कि क्या इससे हमारा कल्याण हो रहा है, हमारा यश बढ़ रहा है तथा क्या इस तरह के कार्य श्रेष्ठ जनों द्वारा पूर्व में किए जाते रहे हैं ।

अभी तक श्लोकों में श्रीकृष्ण उवॉच कहा गया है लेकिन अब इस श्लोक से लेकर आगे जितने भी श्लोक होंगे उनमें श्रीभगवान उवॉच कहा जाएगा अतः हमारे लिए यह जानना आवश्यक होगा कि कि भगवान किसे कहते हैं। कई व्यक्ति अपने को भगवान बताते हैं तो क्या हम उसे सत्य समझ लें। इसके लिए हमें भगवान की ऐश्वर्यों के बारे में जानना होगा ।

श्रीकृष्ण तथा भगवान् अभिन्न हैं, इसीलिए श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण गीता में भगवान् ही कहा गया है | भगवान् परम सत्य की पराकाष्ठा हैं | परमसत्य का बोध ज्ञान की तीन अवस्थाओं में होता है – ब्रह्म या निर्विशेष सर्वव्यापी चेतना, परमात्मा या भगवान् का अन्तर्यामी रूप जो समस्त जीवों के हृदय में है तथा भगवान् या श्रीभगवान् कृष्ण | श्री मद्भागवत में (१.२.११) परम सत्य की यह धारणा इस प्रकार बताई गई है –

वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्यानमद्वयम् |
ब्रह्मेति परमात्मेतिभगवानिति शब्द्यते ||

“परम सत्य का ज्ञाता परमसत्य का अनुभव ज्ञान की तीन अवस्थाओं में करता है, और ये सब अवस्थाएँ एकरूप हैं | ये ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् के रूप में व्यक्त की जाती हैं|”

इन तीन दिव्य पक्षों को सूर्य के दृष्टान्त द्वारा समझाया जा सकता है क्योंकि उसके भी तीन भिन्न पक्ष होते हैं – यथा, धूप(प्रकाश), सूर्य की सतह तथा सूर्यलोक स्वयं | जो सूर्य के प्रकाश का अध्ययन करता है वह नौसिखिया है | जो सूर्य की सतह को समझता है वह कुछ आगे बढ़ा हुआ होता है और जो सूर्यलोक में प्रवेश कर सकता है वह उच्चतम ज्ञानी है | जो नौसिखिया सूर्य प्रकाश – उसकी विश्र्व व्याप्ति तथा उसकी निर्विशेष प्रकृति के अखण्ड तेज – के ज्ञान से ही तुष्ट हो जाता है वह उस व्यक्ति के समान है जो परम सत्य के ब्रह्म रूप को ही समझ सकता है | जो व्यक्ति कुछ अधिक जानकार है वह है | जो व्यक्ति सूर्यलोक के अन्तर में प्रवेश कर सकता है उसकी तुलना उससे की जाती है जो परम सत्य के साक्षात् रूप की अनुभूति प्राप्त करता है |

अतः जिन भक्तों ने परमसत्य के भगवान् स्वरूप का साक्षात्कार किया है वे सर्वोच्च अध्यात्मवादी हैं, यद्यपि परम सत्य के अध्ययन में रत सारे विद्यार्थी एक ही विषय के अध्ययन में लगे हुए हैं | सूर्य का प्रकाश, सूर्य का गोला तथा सूर्यलोक की भीतरी बातें – इन तीनों को एक दूसरे से विलग नहीं किया जा सकता, फिर भी तीनों अवस्थाओं के अध्येता एक ही श्रेणी के नहीं होते |

जैसे वारि, सलिल , तोय, जल | ये सब जल के पर्यायवाची शब्द हैं तो क्या ऐसा है कि एक ही श्री कृष्ण का नाम – ब्रह्म , परमात्मा और भगवान है |
एक ही श्री कृष्ण ब्रह्म , परमात्मा , भगवान कहलाते हुए भी इन तीनो के लक्षण में अन्तर हैं |

एक भी हैं और विशेष लक्षण भी है | ये कभी मत सोचना कि ब्रह्म अलग है , परमात्मा अलग है और भगवान अलग हैं , तीनों एक ही तत्त्व है लेकिन विशेष लक्षण हैं तीनो के अपने – अपने |

उदाहरण के तौर पर एक पानी होता है , एक होती है वर्फ और एक होती है भाप, जल में विशेष ठण्ड डाल दी गई जीरो पर, वो वर्फ बन गई और तापमान दिया गया तो भाप बनकर उड़ गया | तो वरफ , जल , भाप एक ही पदार्थ है, लेकिन तीनों के लक्षण अलग अलग है | काम अलग- अलग है |

अब ब्रह्म किसे कहते हैं तो एक परिभाषा बना दी गई जो निर्विशेष हो | वेदों में शास्त्रों में सब जगह |

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च |
( श्वेता. ६-८)
तस्य शक्तयस्त्वनेकधा ह्लादिनी संधिनी | (राधापनिषद् )

आदि तमाम भरे पड़े हैं मंत्र शास्त्रों में वेदों में , तमाम गीता , भागवत, वेद शास्त्र सब कह रहे है कि ब्रह्म नाम का व्यक्तित्व निर्गुण निर्विशेष है , निराकार है |
और एक होता है परमात्मा , और एक भगवान् | तो भगवान् तो श्रीकृष्ण हैं ।अब इन दोनो के बारे में समझना है |

तीनो में शक्तियाँ है | अब उन शक्तियों का विकास प्राकट्य कहीं पर बहुत कम कहीं पर कुछ अधिक और कहीं पर पूरा | बस इतना सा अन्तर है |

ब्रह्म में शक्तियाँ है पर कम प्रकट हुई और जितनी प्रकट हुई बस उतनी ही है और ऐसा नही कि आज ब्रह्म परमात्मा हो जाये, परमात्मा भगवान हो जाये ऐसा नही होगा |
क्या शक्ति है ब्रह्म के पास ? तो अपनी सत्ता की रक्षा करने की शक्ति और ज्ञान स्वरुप और आनन्द स्वरुप | यानी ब्रह्म सच्चिदानन्द है, ये तीन चीजें जो मैने ब्रह्म की बताई हैं कई बार – सत् , चित् , आनन्द ब्रह्म में भी है , परमात्मा में भी है और भगवान में तो हैं ही हैं | सभी शक्तियाँ है | उनका प्राकट्य ब्रह्म में केवल इतना है कि वो अपनी सत्ता की रक्षा करते हैं और सदा आनन्द स्वरुप रहते हैं , सदा विज्ञान स्वरुप रहते हैं|

इसके आगे कोई शक्तियाँ नही हैं उनमें कि वो आकार भी धारण कर लें , लीलायें भी करें | वो उनमें कोई गुण भी प्रकट हो कृपा आदि के ऐसा कुछ नहीं | शक्ति तो है पर अल्प व्यक्त है | अब अल्प शक्ति भी व्यक्त न होगी तो जो उसमें लीन होगें , वो ब्रह्मानन्दी कैसे बनेंगें ?

इसलिये सबसे कम मात्रा की शक्तियाँ जिसमें प्रकट हैं वो एक सत्ता मात्र , ज्योति मात्र , ज्ञान मात्र , ब्रह्म कहलाता है, यह ज्ञानियों का आराध्य हैं | व्यक्ति साधन चतुष्टय सम्पन्न हो जाने के बाद तो उस अद्वैत ज्ञान के सुनने का अधिकारी हो जाता है , जिनकी संख्या अरबों में कोई एक होता है |देहधारियों के लिये तो यह दुर्गम है लेकिन असंभव नहीं |
ब्रह्म की प्राप्ति हुई है, होती है , और होगी | पर बहुत हीं कठीन है |

संस्कृत शब्द भगवान् कि व्याख्या व्यासदेव के पिता पराशर मुनि ने की है | समस्त धन, शक्ति, यश, सौंदर्य, ज्ञान तथा त्याग से युक्त परम पुरुष भगवान् कहलाता है | ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो अत्यन्त धनी हैं, अत्यन्त शक्तिमान हैं, अत्यन्त सुन्दर हैं और अत्यन्त विख्यात, विद्वान् तथा विरक्त भी हैं, किन्तु कोई साधिकार यह नहीं कह सकता कि उसके पास सारा धन, शक्ति आदि है | एकमात्र कृष्ण ही ऐसा दावा कर सकते हैं क्योंकि वे भगवान् हैं | कोई भी जीव कृष्ण के समान पूर्ण एश्र्वर्यवान नहीं है | अतः ब्रह्मसंहिता में स्वयं ब्रह्माजी का निर्णय है कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं | न तो कोई उनके तुल्य है, न उनसे बढ़कर है | वे आदि स्वामी या भगवान् हैं, गोविन्द रूप में जाने जाते हैं और समस्त कारणों के परम कारण हैं –

भागवत में भी भगवान् के नाना अवतारों की सूची है, कृष्ण को आदि भगवान् बताया गया है, जिससे अनेकानेक अवतार तथा ईश्वर विस्तार करते हैं –

अतः कृष्ण आदि भगवान्, परम सत्य, परमात्मा तथा निर्विशेष ब्रह्म दोनों के अद्गम है |

अक्सर लोग बोलचाल में ब्रह्म को ही परमात्मा और परमात्मा को भगवान समझ लेते हैं। उनके लिए ये शब्द अलग-अलग हैं लेकिन उन्हें लगता है कि सब ईश्वर के ही अलग-अलग नाम हैं। लेकिन वेदों के अनुसार ऐसा नहीं है और ना ही तीनों की उपासना करने वाले सभी जन भक्त कहलाते हैं। अर्थात् ये तीनों तीन अलग-अलग स्वरूप हैं और तीनों के उपासक भी अलग-अलग श्रेणियों में आते हैं। तो, चलिए वेदों के अनुसार समझने का प्रयास करते हैं कि ब्रह्म, परमात्मा और भगवान में क्या अंतर है।

जब हम कहते हैं कि कोई तो परम् तत्व है, जो निर्गुण और निराकार है, तो आप ब्रह्म की बात कर रहे होते हैं। ब्रह्म निर्गुण,निराकार और असीम है। उनका कोई स्वरूप, शरीर या इंद्रिय नहीं है। वह सर्वव्यापक, निराकार और अविनाशी हैं। ब्रह्म ही सच्चिदानंद हैं। उनके पास कोई शक्ति नहीं होती जो प्रकट हो सके लेकिन वह एक शक्तिपूंज के समान हैं। वह अपनी सत्ता की रक्षा कर सकते हैं। ब्रह्म की उपासना करने वाले ज्ञानी कहलाते हैं। आप कह सकते हैं कि आध्यात्मिक लोगों की प्रेरणा का स्रोत ब्रह्म ही होते हैं क्योंकि वो ऊर्जा में यकीन करते हैं, साकार परमात्मा क्या है?

परम् तत्व के साकार रूप को परमात्मा कहते हैं। परमात्मा में गुण भी होता है और आकार भी होता है लेकिन वो ना तो अवतार लेते हैं और ना ही लीला करते हैं। परमात्मा तीनों लोको में हैं, कण-कण में हैं। महाविष्णु को परमात्मा का स्वरूप माना गया है जो बैकुंठ लोक में हैं। परमात्मा के तीन स्वरूप माने गये हैं। पहला , जो सभी ब्रह्मांडों में व्याप्त है। आप जानते हैं कि हिंदू धर्म के अनुसार ब्रह्मांड एक नहीं बल्कि असंख्य है। दूसरे,
जो एक ब्रह्मांड में व्याप्त है और तीसरा, हरेक जीवात्मा के अंदर है। परमात्मा ही सभी जीवों का भरण-पोषण करते हैं। परमात्मा के उपासक योगी कहलाते हैं।

भगवान क्या है?
भगवान की मूर्ति पूजा होती है क्योंकि उनका रूप साकार है। ये अवतार भी लेते हैं, लीला भी करते हैं और इनके पास प्रकट रूप में शक्ति भी होती है। भगवान गुणी हैं, ज्ञानी हैं, साकार हैं, शक्तिपूर्ण हैं, ऐश्वर्यपूर्ण हैं, तेजपूर्ण हैं। जैसे श्रीकृष्ण भगवान हैं। जीवों के कल्याण के लिए ये अक्सर अपना रूप बदलते रहते हैं। भगवान को पूजने वाले भक्त कहलाते हैं।

जैसे वारि, सलिल , तोय, जल | ये सब जल के पर्यायवाची शब्द हैं तो क्या ऐसा है कि एक ही श्री कृष्ण का नाम – ब्रह्म , परमात्मा और भगवान है | हां एक ही श्री कृष्ण ब्रह्म , परमात्मा , भगवान कहलाते हुए भी इन तीनो के लक्षण में अन्तर हैं |
एक भी हैं और विशेष लक्षण भी है | ध्यान दो ये कभी मत सोचना कि ब्रह्म अलग है , परमात्मा अलग है और भगवान अलग हैं , ऐसी दुर्भावना मत करना | तीनों एक ही तत्त्व है लेकिन विशेष लक्षण हैं तीनो के अपने – अपने |

देखिये एक होता है पानी , एक होती है वर्फ और एक होती है भाप, जल में विशेष ठण्ड डाल दी गई जीरो पर, वो वर्फ बन गई | और टेम्प्रेचर दिया गया तो भाप बनकर उड़ गया | तो वरफ , जल , भाप एक ही पदार्थ है, लेकिन तीनों के लक्षण अलग अलग है | काम अलग- अलग है |

अब ब्रह्म किसे कहते हैं तो एक परिभाषा बना दी गई जो निर्विशेष हो | वेदों में शास्त्रों में सब जगह |

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च |
( श्वेता. ६-८)
तस्य शक्तयस्त्वनेकधा ह्लादिनी संधिनी | (राधापनिषद् )

आदि तमाम भरे पड़े हैं मंत्र शास्त्रों में वेदों में , तमाम गीता , भागवत, वेद शास्त्र सब कह रहे है कि ब्रह्म नाम की पर्सनैलिटि निर्गुण निर्विशेष है , निराकार है |
और एक होता है होता है परमात्मा , और एक भगवान् | तो भगवान् तो श्रीकृष्ण हैं उनमें तमाम बहस नहीं है | अब इन दोनो के बारे में समझना है |

तीनो में शक्तियाँ है | एक बात गाँठ बाँध लो | तीनों में सब शक्तियाँ हैं | अब उन शक्तियों का विकास प्राकट्य कहीं पर बहुत कम कहीं पर कुछ अधिक और कहीं पर पूरा | बस इतना सा अन्तर है |

ब्रह्म में शक्तियाँ है पर कम प्रकट हुई और जितनी प्रकट हुई बस उतनी ही है और सदा रहेंगी ये भी याद कर लो | ऐसा नही कि आज ब्रह्म परमात्मा हो जाये, परमात्मा भगवान हो जाये ऐसा नही होगा |

क्या शक्ति है ब्रह्म के पास ? तो अपनी सत्ता की रक्षा करने की शक्ति और ज्ञान स्वरुप और आनन्द स्वरुप | यानी ब्रह्म सच्चिदानन्द है, ये तीन चीजें जो मैने ब्रह्म की बताई हैं कई बार आप लोगों को – सत् , चित् , आनन्द ब्रह्म में भी है , परमात्मा में भी है और भगवान में तो हैं ही हैं | सभी शक्तियाँ है | उनका प्राकट्य ब्रह्म में केवल इतना है कि वो अपनी सत्ता की रक्षा करते हैं और सदा आनन्द स्वरुप रहते हैं , सदा विज्ञान स्वरुप रहते हैं बस |

इसके आगे कोई शक्तियाँ नही हैं उनमें कि वो आकार भी धारण कर लें , लीलायें भी करें | वो उनमें कोई गुण भी प्रकट हो कृपा आदि के ऐसा कुछ नहीं | शक्ति तो है पर अल्प व्यक्त है | अब अल्प शक्ति भी व्यक्त न होगी तो जो उसमें लीन होगें , वो ब्रह्मानन्दी कैसे बनेंगें ?

इसलिये सबसे कम मात्रा की शक्तियाँ जिसमें प्रकट हैं वो एक सत्ता मात्र , ज्योति मात्र , ज्ञान मात्र , ब्रह्म कहलाता है, यह ज्ञानियों का आराध्य हैं | व्यक्ति साधन चतुष्टय सम्पन्न हो जाने के बाद तो उस अद्वैत ज्ञान के सुनने का अधिकारी हो जाता है , जिनकी संख्या अरबों में कोई एक होता है |देहधारियों के लिये तो यह दुर्गम है लेकिन असंभव नहीं |
ब्रह्म की प्राप्ति हुई है, होती है , और होगी | पर बहुत हीं कठीन है |

भगवान् कि उपस्थिति में अर्जुन द्वारा स्वजनों के लिए शोक करना सर्वथा अशोभनीय है, अतः कृष्ण ने कुतः शब्द से अपना आश्चर्य व्यक्त किया है | आर्य जैसी सभ्य जाति के किसी व्यक्ति से ऐसी मलिनता की उम्मीद नहीं की जाती | आर्य शब्द उन व्यक्तियों पर लागू होता है जो जीवन के मूल्य को जानते हैं और जिनकी सभ्यताआत्म-साक्षात्कार पर निर्भर करती है | देहात्मबुद्धि से प्रेरित मनुष्यों को यह ज्ञान नहीं रहता कि जीवन का उद्देश्य परम सत्य, विष्णु या भगवान् का साक्षात्कार है | वे तो भौतिक जगत के बाह्य स्वरूप से मोहित हो जाते हैं, अतः वे यह नहीं समझ पाते कि मुक्ति क्या है | जिन पुरुषों को भौतिक बन्धन से मुक्ति का कोई ज्ञान नहीं होता वे अनार्य कहलाते हैं | यद्यपि अर्जुन क्षत्रिय था, किन्तु युद्ध से विचलित होकर वह अपने कर्तव्य से च्युत हो रहा था उसकी यह कायरता अनार्यों के लिए ही शोभा देने वाली हो सकती है | कर्तव्य-पथ से इस प्रकार का विचलन न तो आध्यात्मिक जीवन की प्रगति करने में सहायक बनता है न ही इससे संसार में ख्याति प्राप्त की जा सकती है | भगवान् कृष्ण ने अर्जुन द्वारा अपने स्वजनों पर इस प्रकार की करुणा का अनुमोदन नहीं किया |

अक्सर लोग बोलचाल में ब्रह्म को ही परमात्मा और परमात्मा को भगवान समझ लेते हैं। उनके लिए ये शब्द अलग-अलग हैं लेकिन उन्हें लगता है कि सब ईश्वर के ही अलग-अलग नाम हैं। लेकिन वेदों के अनुसार ऐसा नहीं है और ना ही तीनों की उपासना करने वाले सभी जन भक्त कहलाते हैं। अर्थात् ये तीनों तीन अलग-अलग स्वरूप हैं और तीनों के उपासक भी अलग-अलग श्रेणियों में आते हैं। तो, चलिए वेदों के अनुसार समझने का प्रयास करते हैं कि ब्रह्म, परमात्मा और भगवान में क्या अंतर है।

जब हम कहते हैं कि कोई तो परम् तत्व है, जो निर्गुण और निराकार है, तो आप ब्रह्म की बात कर रहे होते हैं। ब्रह्म निर्गुण,निराकार और असीम है। उनका कोई स्वरूप, शरीर या इंद्रिय नहीं है। वह सर्वव्यापक, निराकार और अविनाशी हैं। ब्रह्म ही सच्चिदानंद हैं। उनके पास कोई शक्ति नहीं होती जो प्रकट हो सके लेकिन वह एक शक्तिपूंज के समान हैं। वह अपनी सत्ता की रक्षा कर सकते हैं। ब्रह्म की उपासना करने वाले ज्ञानी कहलाते हैं। आप कह सकते हैं कि आध्यात्मिक लोगों की प्रेरणा का स्रोत ब्रह्म ही होते हैं क्योंकि वो ऊर्जा में यकीन करते हैं, साकार परमात्मा क्या है?

परम् तत्व के साकार रूप को परमात्मा कहते हैं। परमात्मा में गुण भी होता है और आकार भी होता है लेकिन वो ना तो अवतार लेते हैं और ना ही लीला करते हैं। परमात्मा तीनों लोको में हैं, कण-कण में हैं। महाविष्णु को परमात्मा का स्वरूप माना गया है जो बैकुंठ लोक में हैं। परमात्मा के तीन स्वरूप माने गये हैं। पहला , जो सभी ब्रह्मांडों में व्याप्त है। आप जानते हैं कि हिंदू धर्म के अनुसार ब्रह्मांड एक नहीं बल्कि असंख्य है। दूसरे, जो एक ब्रह्मांड में व्याप्त है और तीसरा, हरेक जीवात्मा के अंदर है। परमात्मा ही सभी जीवों का भरण-पोषण करते हैं। परमात्मा के उपासक योगी कहलाते हैं।

भगवान क्या है?
भगवान की मूर्ति पूजा होती है क्योंकि उनका रूप साकार है। ये अवतार भी लेते हैं, लीला भी करते हैं और इनके पास प्रकट रूप में शक्ति भी होती है। भगवान गुणी हैं, ज्ञानी हैं, साकार हैं, शक्तिपूर्ण हैं, ऐश्वर्यपूर्ण हैं, तेजपूर्ण हैं। जैसे श्रीकृष्ण भगवान हैं। जीवों के कल्याण के लिए ये अक्सर अपना रूप बदलते रहते हैं। भगवान को पूजने वाले भक्त कहलाते हैं।

हमारे श्री महाराज जी ने इस विषय (तत्व ज्ञान ) पर बड़े ही सुन्दर ढगं से प्रकाश डालें है ( दिव्य स्वार्थ पेज नं – ३९ ,४०, ४१ तथा ४२) प्रस्तुत है उनके ही श्री मुख से- एक का नाम ब्रह्म , एक का नाम परमात्मा, एक का नाम भगवान् | तो क्यों जी एक तत्त्व श्री कृष्ण के ये तीन नाम हैं या इनमें कोई अन्तर है | ध्यान दो , बहुत इम्पॉर्टेन्ट है |

तीनो में शक्तियाँ है | एक बात गाँठ बाँध लो | तीनों में सब शक्तियाँ हैं | अब उन शक्तियों का विकास प्राकट्य कहीं पर बहुत कम कहीं पर कुछ अधिक और कहीं पर पूरा | बस इतना सा अन्तर है |

ब्रह्म में शक्तियाँ है पर कम प्रकट हुई और जितनी प्रकट हुई बस उतनी ही है और सदा रहेंगी ये भी याद कर लो | ऐसा नही कि आज ब्रह्म परमात्मा हो जाये, परमात्मा भगवान हो जाये ऐसा नही होगा |

क्या शक्ति है ब्रह्म के पास ? तो अपनी सत्ता की रक्षा करने की शक्ति और ज्ञान स्वरुप और आनन्द स्वरुप | यानी ब्रह्म सच्चिदानन्द है, ये तीन चीजें जो मैने ब्रह्म की बताई हैं कई बार आप लोगों को – सत् , चित् , आनन्द ब्रह्म में भी है , परमात्मा में भी है और भगवान में तो हैं ही हैं | सभी शक्तियाँ है | उनका प्राकट्य ब्रह्म में केवल इतना है कि वो अपनी सत्ता की रक्षा करते हैं और सदा आनन्द स्वरुप रहते हैं , सदा विज्ञान स्वरुप रहते हैं बस |

इसके आगे कोई शक्तियाँ नही हैं उनमें कि वो आकार भी धारण कर लें , लीलायें भी करें | वो उनमें कोई गुण भी प्रकट हो कृपा आदि के ऐसा कुछ नहीं | शक्ति तो है पर अल्प व्यक्त है | अब अल्प शक्ति भी व्यक्त न होगी तो जो उसमें लीन होगें , वो ब्रह्मानन्दी कैसे बनेंगें ?

इसलिये सबसे कम मात्रा की शक्तियाँ जिसमें प्रकट हैं वो एक सत्ता मात्र , ज्योति मात्र , ज्ञान मात्र , ब्रह्म कहलाता है, यह ज्ञानियों का आराध्य हैं | व्यक्ति साधन चतुष्टय सम्पन्न हो जाने के बाद तो उस अद्वैत ज्ञान के सुनने का अधिकारी हो जाता है , जिनकी संख्या अरबों में कोई एक होता है |

देहधारियों के लिये तो वो दुर्गम है लेकिन इम्पॉसिबिल नहीं |
ब्रह्म की प्राप्ति हुई है, होती है , और होगी | पर बहुत हीं कठीन है |

अब परमात्मा को देखिये , परमात्मा में बहुत शक्तियाँ प्रकट होती हैं , वो उसको साकार बना देती हैं | उसको शरीर रुप में बना देती हैं | आँख , कान , नाक पूरा जैसे आपका मनुष्य का शरीर है ऐसा | और इतना ही अन्तर है कि आपके दो हाथ हैं उनके चार हाथ होते हैं | वो महाविष्णु हैं | और महाविष्णु के एक निराकार रुप भी हैं , जो आपके अन्त:करण में बैठकर आपको शक्ति देतें हैं और आपके कर्मो को नोट करते हैं , हिसाब किताब रखते हैं | इनका एक और रुप है जो एक ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं | और एक तीसरा रुप भी है जो अनन्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है | तो महाविष्णु के तीन प्रकार हो गये , एक समष्टि ब्रह्माण्ड में व्याप्त , एक व्यष्टि ब्रह्माण्ड में व्याप्त और एक जीवात्मा में व्याप्त ।

भगवान श्री कृष्ण का अशं पुरुष ( महाविष्णु ) हैं | और पुरुष जो है तीन प्रकार का होता है | कारणार्णवशायी , गर्भोदशायी, क्षीरोदशायी | इसलिये परमात्मा भी तीन प्रकार का हो गया | किन्तु प्रमुख रुप से परमात्मा उसी को माना जाता है जो महाविष्णु हैं , जो आपमें बैठ कर आपको शक्ति देते हैं , आपके कर्मो को नोट करते है और आपके कर्मो का फल देतें हैं जो निराकार रुप मे आपके अंदर रहते हैं |

और साकार रुप में वैकुण्ठ में हैं | उनका नाम भी है , गुण भी है , रुप भी है और धाम भी है | परन्तु लीला और परिकर नहीं हैं | इनकी उपासना होती है | योगीजन इनकी उपासना करते हैं | ये भी भगवान् श्रीकृष्ण का ही रुप हैं |

और तीसरा रुप तो आपलोग जानते ही हैं जो राधाकृष्ण का रुप , जिसमे पूरी की पूरी शक्ति व्यक्त है , भगवान मे पूरी शक्ति व्यक्त है , इनका धाम भी है , रुप भी है , गुण भी है , लीला भी है और परिकर भी है ,जिसकी उपासना आपलोग करते हैं | तो उन्ही राधाकृष्ण का ही दूसरा रुप परमात्मा और तीसरा रुप ब्रह्म हैं | और सब लक्षण विशेष का अन्तर होते हुए एक ही है |ब्रह्म के उपासक को ज्ञानी कहा जाता है , परमात्मा के उपासक को योगी कहा जाता है | और भगवान के उपासक को भक्त कहते

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